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जानकारी का खजाना >> किशोरावस्था में गर्भधारण ......

प्रजनन स्वास्थ्य के अनुसार 19 साल से कम उम्र की महिला द्वारा बच्चे को जन्म देना मां और नवजात शिशु दोनों के लिये खतरनाक हो सकता है. हमारे देश में उच्च मातृ-मृत्यु दर तथा उच्च शिशु मृत्यु दर का एक प्रमुख कारण, कम उम्र में किशोरियों द्वारा गर्भधारण तथा बच्चे को जन्म देना है.
 

 

किशोर गर्भावस्था एवं प्रसव पूर्व परिचर्याः

 

गर्भावस्था के दौरान प्रसव पूर्व परिचर्या का काफी महत्व होता है विशेषकर किशोरियों के लिए इस परिचर्या का महत्व इस लिए भी बढ जाता है कि इस उम्र में मां बनने से सामाजिक, आर्थिक व स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ जाती है. गर्भावस्था के दौरान; गर्भवती स्त्री का वजन, रक्त दाब तथा गर्भाशय के आकार का आंकलन कर, गर्भ के संतोषजनक प्रगति की जानकारी ली जा सकती है. अतः प्रसव पूर्व परिचर्या की शुरुआत गर्भावस्था के पहली तिमाही से हीं कर देनी चाहिए ताकि किसी भी जटिलता का पता लगाया जा सके तथा समय से उसका निदान किया जा सके.   
प्रसवपूर्व परिचर्या जांच निम्न-अंतराल पर की जानी चाहिए.
पहली तिमाही ( 12 सप्ताह ) प्रथम प्रसव पूर्व परिचर्या
दूसरी तिमाही( 12-24 सप्ताह)  दृतीय प्रसव पूर्व परिचर्या
तीसरी तिमाही ( 24-40 सप्ताह) तृतीय प्रसव पूर्व परिचर्या
स्वास्थ्य केंन्द्र में उपलब्ध कार्ड में प्रसव से संबधित रिकॉड रखना चाहिए ताकि समुचित विकास और निदान को सुनिश्चित किया जा सके.  स्वास्थ्य कार्यकर्ता को गर्भवती किशोरी एवं उसके परिवार के सदस्यों के साथ प्रसव संबंधित योजना पर विचार करना चाहिए जैसेः प्रसव कहां करानी है आदि. साथ हीं उन्हें प्रेरित किया जाना चाहिए कि वे प्रसव के लिए स्वास्थ्य केंन्द का चयन करें.
 
किशोर गर्भवती स्त्री को वयस्क माताओं की अपेक्षा ज्यादा पोषण व देखरेख की जरुरत होती है, इसके कुछ निम्नलिखित कारण हैः
प्रथम मासिक धर्म के चार से पांच वर्षों तक किशोरी के शरीर का विकास जारी रहता है, इस दौरान यदि वह गर्भवती हो जाती है तो भ्रूण के विकास के साथ हीं उसे अपने विकास के लिए भी अतिरिक्त पोषण की आवश्यकता को पुरा करना पडता है, जिसका ध्यान रखा जाना चाहिए.
 
किशोरियों में रक्ताल्पता, पोषण की एक प्रमुख कमी के रुप में व्याप्त है जो मुख्यतः शरीर में आयरन की कमी के कारण होता है. गर्भावस्था के दौरान पोषण तथा आयरन की आवश्यकता और बढ जाती है.
अतः इस अवस्था में किशोरियों को आयरन से युक्त पोषक पदार्थो का उपयोग करना चाहिए तथा विटामिन सी से युक्त पदार्थों का सेवन करना चाहिए जो भोजन में आयरन की कमी को पुरा करने मे सहायता करता है.  सामान्यतः इस अवस्था में हरी पत्तिदार सब्जियां,फलियां,गिरीदार फल, तिलहन, गुड और मांस उत्त्पाद लेने चाहिए. इसके अतिरिक्त विटामिन सी की आपूर्ती के लिए नींबू, आंवला, अमरुद और अंकुरित दाल लिए जाने चाहिए
 
यदि गर्भावस्था के दौरान रक्ताल्पता पाई जाती है तो आयरन एवं फॉलिक एसिड 200 मि.ग्रा. प्रतिदिन दी जानी चाहिए.गर्भाधारण के चार महिने के बाद से प्रसव के तीन महिने तक अयरन की गोली प्रदान करने से गर्भवती किशोरी के रक्ताल्पता को ठीक किया जा सकता है.
 
किशोर गर्भवती महिलाओं को भी अन्य गर्भवतियों की तरह टेटनस की दो खुराकें 4-6 सप्ताह के अंतर पर दी जानी चाहिए.
गर्भावस्था के दौरान कठिन शारीरिक श्रम से बचना चहिए.
 
खतरे के लक्षण दिखने पर प्रसव पूर्व परिचर्याः
किशोरावस्था में गर्भधारण से कुछ जटिलतांए भी उत्पन्न हो सकती है जैसे पेट में दर्द, योनि से रक्त स्राव, सिरदर्द व उल्टी के साथ पैरो तथा चेहरों पर सुजन, भ्रूण का कम हिलना डुलना, सांस लेने में परेशानी तथा पेशाब का कम आना आदि.
यदि निम्न में से कोई भी लक्षण दिखाई पडे तो किशोर युवती को स्वास्थ सेवा प्रदायक से संपर्क करना चाहिए तथा निकटतम स्वास्थ्य केन्द्र में जाना चाहिए.
योनि से अत्यधिक रक्तस्राव
स्राव में दुर्गंध
कंपकंपी एवं ऐठन के साथ बुखार
पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द